भारत सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ओएनजीसी (ONGC) को मंगलुरु में एक नया रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserve) बनाने का निर्देश दिया है। करीब ₹15,000 करोड़ की लागत वाला यह प्रोजेक्ट अंतरराष्ट्रीय संकट के समय देश में ईंधन की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बनेगा।
युद्ध के संकट के बीच बड़ा कदम
ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति लाइनों में आई अनिश्चितता ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। वर्तमान में भारत अपनी कच्चा तेल (Crude Oil) की लगभग 88 प्रतिशत जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, जिससे वैश्विक आपूर्ति बाधित होने पर देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ता है। इसी खतरे को देखते हुए सरकार ने ओएनजीसी को यह मेगा प्रोजेक्ट सौंपा है।
प्रोजेक्ट का विवरण और लागत
मंगलुरु में प्रस्तावित यह भूमिगत गुफा (Underground Cavern) 1.75 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) क्षमता की होगी। इस प्रोजेक्ट पर होने वाले कुल ₹15,000 करोड़ के निवेश को दो मुख्य हिस्सों में बांटा गया है। लगभग ₹5,000 करोड़ भूमिगत गुफा और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण पर खर्च होंगे, जबकि ₹10,000 करोड़ का उपयोग इस भंडार को कच्चे तेल से भरने के लिए किया जाएगा। यह नई सुविधा भारत की वर्तमान 5.33 MMT की कुल भंडारण क्षमता को लगभग एक-तिहाई बढ़ा देगी।
रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव
इस बार सरकार ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए ओएनजीसी को इस भंडार की फाइनेंसिंग और निर्माण की पूरी जिम्मेदारी खुद उठाने को कहा है। इससे पहले भारत के सभी रणनीतिक तेल भंडार पूरी तरह से सरकारी फंडिंग द्वारा 'इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड' (ISPRL) द्वारा बनाए और प्रबंधित किए जाते थे। चूंकि ओएनजीसी के पास पहले से ही इस प्रोजेक्ट के लिए आवश्यक भूमि उपलब्ध है, इसलिए निर्माण कार्य जल्द शुरू होने की उम्मीद है।
देश पर प्रभाव और महत्व
यह पहल भारत को ऊर्जा सुरक्षा के मामले में चीन, अमेरिका और जापान जैसे देशों के वैश्विक मानकों के करीब ले जाएगी। विशाल तेल भंडार न केवल आपातकालीन स्थिति में ईंधन की कमी को रोकते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों की भारी अस्थिरता और मुद्रा के उतार-चढ़ाव के समय अर्थव्यवस्था के लिए बफर के रूप में कार्य करते हैं।