22 अप्रैल आज के दिन पहलगाम में आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम की बैसरन घाटी को सैलानियों के खून से रंग दिया था। इस घटना में 26 लोगों की जान गई थी। यह आतंकी हमला आज भी लोगों के दिलों में गहरी टीस की तरह जिंदा है। जान गंवाने वालों में पोनीवाले सैयद आदिल हुसैन शाह भी थे।

आदिल के परिवार को मिला नया घर |
शिवसेना ने हमले की पहली बरसी पर आदिल अहमद के पैतृक गांव हापटनार में एक कार्यक्रम आयोजित किया। शिंदे ने कार्यक्रम में वर्चुअल माध्यम से भाग लिया। महाराष्ट्र के मंत्री संजय शिरसात और योगेश रामदास कदम हापटनार में आदिल की याद में बने मकान को सौंपने के लिए उपस्थित थे।शिंदे ने कहा था, मैं आपका आदिल
आदिल के पिता सैयद हैदर शाह ने कहा कि परिवार शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंदे का मकान और आर्थिक सहायता के लिए आभारी है। उन्होंने यह भी कहा कि वे जम्मू-कश्मीर सरकार के भी आभारी हैं जिसने आदिल की पत्नी और छोटे भाई को नौकरी मुहैया कराई है। सैयद ने कहा कि उन्होंने (शिंदे) हमें श्रीनगर में बैठक के लिए बुलाया था और उनकी टीम अभी भी हमसे संपर्क में है। उनके एक सहायक ने हमसे कहा, 'हम आपके बेटे जैसे हैं...मैं भी आपका आदिल हूं।' इससे हमें हिम्मत मिली है।
पिता ने बेटे के बलिदान को किया याद
परिवार को सरकार से भी मदद मिली है। आदिल की पत्नी को नौकरी मिली और आर्थिक सहायता भी दी गई। उन्होंने कहा कि कोई भी सहायता बेटे के खोने के दुख की भरपाई नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि चाहे कुछ भी दे दिया जाए, जाने वाले की कमी पूरी नहीं हो सकती। मन को शांति नहीं मिलती। सैयद ने अपने बेटे के बलिदान को याद करते हुए कहा कि यह धार्मिक भेदभाव से ऊपर मानवता को महत्व देने का एक उदाहरण है।
"उसे अपनी जान की परवाह नहीं थी। उसने दूसरों को बचाने के लिए अपनी जान दे दी। उसने हिंदू, मुसलमान या सिख का भेद नहीं किया। उसने दिखाया कि मानवता सर्वोपरि है, सबकी रगों में एक ही खून बहता है। हमें इस बात पर गर्व है कि आदिल के बलिदान ने मानवता के मूल सिद्धांतों को प्रदर्शित किया।"
— आदिल के पिता सैयद हैदर शाह
परिवार का पालन-पोषण करता था आदिल
पिता ने कहा कि आदिल परिवार की रीढ़ था। सारी जिम्मेदारियां उसी पर थीं...माता-पिता, भाइयों, सबकी देखभाल करना... लेकिन यह अल्लाह की मर्जी थी।नसैयद ने कहा कि एक वर्ष बीत जाने के बाद भी उसकी यादें ताजा हैं। उन्होंने कहा कि हम आदिल को हर पल याद करते हैं। घर में उसकी तस्वीरें देखकर हमें उसकी याद और भी ज़्यादा आती है। हर साल इस समय वह पहलगाम जाता था लेकिन आज वो जमीन में दफन है।
"जब भी ये ख्याल आता है कि वह हमारे बीच नहीं हैं तो दिल बहुत दुखी होता है। मगर फख्र इस बात का है कि पूरा मुल्क आज उनकी मिसाल दे रहा है।"
— फिरोज़ शाह (आदिल के भाई)
"आतंकियों ने नाम पूछकर गोली मारी थी, मगर मेरे बेटे ने किसी का नाम नहीं देखा, किसी मजहब को नहीं चुना, उसने इंसानियत को चुना और आतंकियों से भिड़ गया। मैं बस इतना कहूंगा कि बाकी लोग भी इसी तरह इंसानियत को कायम रखें। चाहें किसी भी मजहब के हों। इंसानियत नहीं बची तो आतंकी अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगे।"
— आदिल के पिता
सरकार ने हमारी बहुत मदद की। पूरे देश के लोगों से प्यार, हमदर्दी और हिम्मत मिली। मगर जवान बेटे को खोने का गम इतना बड़ा है कि उसकी भरपाई नहीं हो सकती। मेरे बेटे ने इंसानियत के लिए अपना सीना आगे कर दिया। इसका मुझे फख्र है। मगर जब उसकी मां रोती है, तो दर्द पूरे परिवार को होता है।