इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने आयकर विभाग (Income Tax Department) को बड़ा झटका देते हुए 2 साल पहले मृत हो चुके व्यक्ति के नाम जारी धारा 148 का टैक्स नोटिस, री-असेसमेंट आदेश और ₹39.67 लाख की टैक्स देनदारी को पूरी तरह रद्द कर दिया है।
यह याचिका आशा दुबे द्वारा दायर की गई थी, जिनके पति संजय दुबे का जनवरी 2024 में निधन हो चुका था। इसके बावजूद, आयकर विभाग ने मार्च 2025 में उनके नाम पर नोटिस भेजा। विभाग का दावा था कि ओमैक्स ग्रुप पर पड़ी रेड के दौरान संजय दुबे द्वारा फ्लैट खरीदते समय ₹27.44 लाख नकद देने की जानकारी मिली थी। बाद में विभाग ने पत्नी को कानूनी उत्तराधिकारी मानकर टैक्स की देनदारी तय की।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मृत व्यक्ति के नाम नोटिस जारी करना केवल तकनीकी खामी नहीं, बल्कि अधिकार क्षेत्र से जुड़ी गंभीर गलती है जिसे आयकर अधिनियम की धारा 292B के तहत सुधारा नहीं जा सकता। वैध नोटिस ही पूरी कार्रवाई का आधार होता है; अतः नींव ही गलत होने पर पूरी कार्रवाई अवैध है। इसके साथ ही कोर्ट ने वित्त मंत्रालय को इस कानूनी कमी को दूर करने के लिए संसद में संशोधन पर विचार करने की सिफारिश की है।
प्रभाव / प्रतिक्रिया:
- अधिकार क्षेत्र पर स्पष्टता: अदालत के इस फैसले से यह साफ हो गया है कि जीवित रहते वैध प्रक्रिया शुरू किए बिना मृत व्यक्ति के लीगल हेयर्स (कानूनी उत्तराधिकारियों) पर सीधी टैक्स देनदारी थोपी नहीं जा सकती।
- टैक्सपेयर्स को राहत: यह फैसला उन परिवारों के लिए एक मिसाल बनेगा जो परिजनों के देहांत के बाद आयकर विभाग के गलत नोटिस और बेबुनियाद टैक्स मांगों से जूझते हैं।
- कानूनी संशोधन की सिफारिश: हाईकोर्ट के आदेश की प्रति भारत सरकार के वित्त मंत्रालय को भेजी गई है, जिससे भविष्य में आयकर अधिनियम में आवश्यक विधायी संशोधन का रास्ता साफ हो सकता है।
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Allahabad High Court quashes Income Tax Department's notice and reassessment order issued to a deceased individual, urging the Finance Ministry and Parliament to consider amending the law.