पश्चिम बंगाल में सत्ता गंवाते ही टीएमसी में सियासी संकट गहरा गया है। पार्टी के 60 विधायकों और 20 सांसदों के साथ छोड़ने के बीच ममता बनर्जी के लिए राहत की बात यह है कि बिहार के दो दिग्गज नेता, शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद, उनके साथ चट्टान की तरह खड़े हैं।
विधायकों और सांसदों की बड़ी बगावत
डेढ़ दशक तक सत्ता में रहने के बाद, पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी की पकड़ कमजोर होती दिख रही है। टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 60 बागी हो गए हैं और उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया है। विधायकों के बाद अब सांसदों ने भी बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, टीएमसी के 28 में से 20 सांसदों ने ममता बनर्जी से अलग होने का मन बना लिया है।
इनमें से 19 लोकसभा सांसदों ने स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर अलग गुट बनाने और एनडीए (NDA) को समर्थन देने की मांग की है। बागी सांसदों की सूची में काकोली घोष दस्तीदार, यूसुफ पठान, सयोनी घोष और शताब्दी रॉय जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इसके अलावा, राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक ने भी पद से इस्तीफा देकर पार्टी छोड़ दी है।
ममता की 'ढाल' बने शत्रुघ्न और कीर्ति आजाद
पार्टी में मची इस भगदड़ के बीच बिहार से ताल्लुक रखने वाले दो सांसद—शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद—ममता बनर्जी के सबसे वफादार सिपहसालार बनकर उभरे हैं। शत्रुघ्न सिन्हा, जो आसनसोल से सांसद हैं, ने स्पष्ट किया है कि वे मुश्किल दौर में ममता बनर्जी को अकेला नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने कहा कि जब वे मुश्किल में थे, तब ममता उनके साथ खड़ी थीं, इसलिए अब वे उनके प्रति अपनी प्रतिबद्धता निभाएंगे।
वहीं, बर्दवान-दुर्गापुर से सांसद और टीएमसी के राष्ट्रीय प्रवक्ता कीर्ति आजाद न केवल ममता के साथ खड़े हैं, बल्कि उन्होंने बागियों के खिलाफ मोर्चा भी खोल दिया है। कीर्ति आजाद ने बागी सांसदों को चुनौती देते हुए कहा कि यदि उनमें साहस है, तो वे सांसद पद से इस्तीफा देकर दिखाएं।
सियासी संकट और प्रभाव
ममता बनर्जी के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है, क्योंकि उनके 'राइट हैंड' कहे जाने वाले कल्याण बनर्जी ने भी बगावती तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। बंगाली अस्मिता की राजनीति करने वाली टीएमसी में आज वही बंगाली नेता साथ छोड़ रहे हैं जिन्हें ममता ने बुलंदियों पर पहुंचाया था। ऐसे में बाहरी और गैर-बंगाली कहे जाने वाले इन दो बिहारी नेताओं की वफादारी बंगाल की राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई है।